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अक्कड़ बक्कड़ तीन थप्पड़!! (कटाक्ष - व्यंग जो भी कह लें )

Posted On: 5 Jan, 2012 Others में

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इस रचना का शीर्षक मेरे करीब है. इसपे एक बात बताता हूँ. मेरे पिता जी एक लेखक थे. अब नहीं लिखते. लिखना बंद कर दिया काफी पहले. धरमयुग मैं काफी रचनाय प्रकाशित हुईं थीं उनकी. गृह मंत्रालय द्वारा पुरस्कार भी मिला.इसी शीर्षक पे पिता जी ने एक धारावाहिक लिखी थी. यह आज तक न बन पायी. उन्होने दो धारवाहिक लिखी थी. एक पे धारवाहिक बनी लेकिन लेखक का नाम बदल दिया गया. किसी बडे लेखक का नाम था. पिता जी छोटे लेखक थे. उन्होने लिखना बंद कर दिया.
इस बात को छोडिये.जो बीत गयी वो बात गयी. अब आते हैं थप्पड़ पे. बचपन मैं हम बहुत बार थप्पड़ खाते हैं. कभी कभार समझ में भी नहीं आता था की पिटाई क्यूँ हो गई. जब हम बडे होते हैं और वर्त्तमान से भूत की तरफ देखते हैं तब सब कुछ पता चल जाता है. हँसी भी आती है. मैने तो ऐसे कई काण्ड किये हैं. बेचारे मेरे माता पिता कितने शर्मसार हुवे और खीझ कर थप्पड़ लगा दिया. में बच्चा था उनको समझ नहीं पाया न खुद की गलती. गलती नहीं कहना चाहिए. नादानी उपयुक्त शब्द होगा. सोचता था मेरे पिता कितने खराब हैं, बिना वजह मार देते हैं. हम समझते थे की हम खेल रहे हैं अक्कड़ बक्कड़ जैसा और थप्पड़ खा जाते थे. एक – दो प्रसंग आपको भी सुनाता हूँ.
शायद मैं ८-९ साल का होऊंगा. घर पे नया नया केबल टी.बी. लगा था. हमेशा एक प्रचार यानि विज्ञापन आता था. विज्ञापन में एक लड़का किसी दवा की दुकान पे कुछ मांगने से झिझकता था. तभी एक दूसरा नौजवान धड़ल्ले से आता और बिना लाग – लपेट के कहता – “moods please”. बचपन में हम सब विज्ञापन याद कर लेते थे. एकदिन यह विज्ञापन आ रहा था. मैने पहले ही चिल्लाया – moods please . घर के सभी बडे बुजुर्ग बैठे थे . सब हस दिए. लोग हसी के साथ मैं भी हँसा, अच्छा लगा. शायद माँ को शर्मिंदगी महसूस हुई. उन्होने एक धोल्ला दिया. किसी और दिन पिता जी के कुछ मित्र आये थे. उनके साथ उनकी 15 -16 वर्षीय बेटी भी थी. तभी येही विज्ञापन आया. मुझे लगा, मुझे सब को हसना चाहिए. फिर क्या था, मैने “Moods Please ” फिर से चिल्लाया. पिता जी के मित्र चौक्क से गए. उनकी बेटी ने कहा हे राम छि. अपनी बेटी को, पिता जी के मित्र ने घूर के देखा और एक थप्पड़ लगा दिया. उसे इसलिए मार पड़ी की उसे पता था की विज्ञापन किस विषय पे है और छि कर के उसने सब के सामने इस बात का सबूत पेश कर दिया. इसके बाद मेरी बारी थी. मेरे पिता जी ने भी खीच के एक लगा दिया. मुझे समझ में नहीं आया था की हुआ क्या? कल तक तो इसी पे सब हस रहे थे, और आज बिना वजह इसी बात पे मार पड़ गयी!
एक दूसरा खिस्सा सुनाता हूँ. यह भी कंडोम पे ही है. इस चीज़ से मेरा बचपन का नाता है. आज कल विज्ञापन मैं कबड्डी के जगह खिलाडी को कंडोम बोलते सुनता हूँ तो लगता है की न जाने कितने बच्चे अभी थप्पड़ खा रहे होंगे! उनको तो समझ में भी नहीं आता होगा की किस बात की सजा मिल गयी. हुआ यूं की “Moods Please ” वाली घटना के कुछ वर्षों बाद मैं तीसरी या चौथी वर्ग में पंहुचा . क्लास के एक लड़के ने मुझे १ रुपये मैं एक बल्लोन दिया. बल्लून एक पलास्टिक के व्रपेर मैं था काफी बड़ा था. मैने आज तक ऐसा बल्लून नहीं देखा था. बल्लून फुलाने मैं दिक्कत हुई, तो मैने पानी भर के अपने रूम मैं टांग दिया. शाम को पिता जी आये और वो बलून देख के आग बबूला हो गए. मेरी पिटाई हुई. मुझे पता नहीं चला, एक बल्लूँ पे इतना हंगामा क्यूँ? पिता जी स्कूल भी गए और उस बेचारे लडके की भी पिटाई हुई.
आज बैठ के यह सब सोचता हूँ तो हसी भी आती है. जैसा मैने कहा हर बार ऐसे विज्ञापन देख के अपने पुराने दिन याद करता हूँ. एक बार पिता जी ने कहा था की यह बलून से तब खेलना जब बडे हो जाना. सोच के बात मैं मुस्कुरा देता हूँ. सच मैं बच्चे बड़ों को अजीब सी परेशानी मैं डाल देते हैं. कभी उनकी पिटाई नहीं होती, कभी हो जाती है.

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