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अब हिंदी कौन पढता है ? ( व्यंग)

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मैं एक माध्यम वर्गीय परिवार से हूँ, और बंगलोरे मे एक कंप्यूटर इंजिनियर हूँ. हर सुबह मैं कार्यालय की ओर निकलता हूँ, जो की इलेक्ट्रोनिक्स सिटी में है. मेरे घर से ये करीब २० की. मी. की दुरी पे है. और में ये दूरी बस से तय करता हूँ.करीब १ घंटे  का समय लगता है बस को मेरे कार्यालय पहुचने में. हर लोग बस में नवयुवक, नवयुवतियों को मैं इंग्लिश नोवेल्स पढते देखता हूँ. समय बिताने  का अच्छा जरिया है, की खाली समय में कुछ पढ़ा जाये. मैं भी पढता हूँ. इसी बस में मैने कई प्रसिद्ध किताबे पढ़ीं हैं. जैसे की पि .  जी  . वोदेहौसे , ‘The Godfather ‘ , The Kite Runner ‘. ये सारी रोचक कहानिया हैं. अद्दभूत ओर बेमिशाल.

एक दिन मुझे लगा की, मुझे अपनी मातृभाषा की रोचक कहानिया भी पढनी चाहिए. मैने याद करने की कोशिश की, की में कितने ऐसे हिंदी साहित्य के लेखको को जनता हूँ? प्रेमचंद, राहुल संक्रित्यान, …. बस. उसके बाद मैने अपने दिमाग पे जोर दिया. कोई भी नाम याद नहीं आया. यह नाम भी मैं इसलिए जनता हूँ, क्यूंकि मैने इन्हे अपनी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में पढ़ी थी. इंग्लिश के  लेखकों के नाम आप मुजसे  पूछे तो मैं अर्ध शतक लगा दूं.  फिर मैने अपने दोस्तों से पुछा. सब उत्तर भारतीये  हैं और हिंदी अच्छी बोलते हैं. सब चुप. किसी ने कहा में अंग्रेजी माध्यम से हूँ ,तो  किसी ने कहा की उन्हे पता नहीं है. हाँ प्रेमचंद का नाम सब ने लिए.

हम २०-२५ साल के नवयुवक उस बिरादरी से हैं की हमें नहीं पता, की अभी हिंदी की परसिद्ध उपन्यास कौन सी है या लेखक कौन सा है. इंग्लिश में भारतीय लेखक बहुत मिलेंगे लेकिन हिंदी में? मैने पता लगाने की ठानी की मुझे कोई नयी हिंदी साहित्य पढनी है, लेकिन मेरे किसी भी मित्र, बंधू या भाई को इसकी कोई जानकारी नहीं है. मैने बंगलोरे की सबसे बड़ी किताबों की दूकान ‘लैंडमार्क’ में गया. लेकिन वहाँ भी निराशा!  या तो वो मुझे इंग्लिश साहित्य के बारे में बताते जो की किसी भारतीये ने लिखी हो , या तो प्रेमचंद ..

मैने यह बात अपनी पिता जी से कही. उन्होने बताया की आज कल हिंदी पढता ही कौन है? सब अपनी इंग्लिश दुरुस्त करने में लगे हैं. अगर किसी का बच्चा इंग्लिश नोवेल पढता है तो उसके माँ बाप का सीना फूल के चौड़ा हो जाता है. नए भारतीये लेखक जो प्रसिद्ध हैं वो इंग्लिश में लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानी पे हिंदी फिल्म बनाई जाती है.

तब मुझे  एक किताब पिता जी ने दी. आवारा भीड़ के खतरे.जो की नयी नहीं है, काफी पुरानी है.  हरिशंकर परसाई जी की यह एक लाजवाब निबंध संग्रह है. इंग्लिश के किताबों से कहीं आगे. मुझे  गर्व हुआ की में हिंदी भाषी हूँ.

मैं यह किताब आज बस  में पढ़ रहा था. मेरे बगल में एक युवती बैठ थी. उसने देखा की में एक हिंदी साहित्य पढ़ रहा था. उसने मुझे घूरा, गोया मैं एक विलुप्त प्रजाति हूँ.

उसने पुछा ‘ आर यू फ्रॉम बिहार’? मैने कहा एस, व्ह्य यू अरे अस्किंग थिस? उसने मेरे किताब की तरफ इशारा किया. ‘ बेकौसे ओनली बिहारिस रड्स हिंदी.?

मुझे  समझ मैं नहीं आया उसने मेरा मखौल उड़ाया  या तारीफ की!  मै अपने हिंदी साहित्य मैं खो गया.

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Delphia के द्वारा
October 17, 2016

Didn’t know the forum rules allowed such brililant posts.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 6, 2012

प्रिय रूद्र जी, नमस्कार. आप कह देते मैं हिन्दुस्तानी हूँ.. पढ़ कर पुराने दिन याद आ गए. अब ज्यादा नहीं कहूँगा, सहमत हूँ आपसे. मिलते रहिएगा. मैं ये नहीं कहूँगा की मेरी पुरानी पोस्ट को देखे, देखिये मैं हिंदी कैसे लिखता हूँ. आलेख मन को छू गया. बधाई.

yogi sarswat के द्वारा
February 6, 2012

नहीं ! आप ऐसा नहीं कह सकते ! हिंदुस्तान में भले ही हिंदी को पढने वाले कम हो रहे हों किन्तु दुनिया में बढ़ रहे हैं ! हिंदी के television चैनल अंग्रेजी के चैनलों से ज्यादा फामस हैं ! रूद्र साब , आपने शायद मुझे अपना आशीर्वाद न देने की कसम खा राखी है ! लेकिन जब तक आपकी प्रतोक्रिया नहीं मिलती , आपको परेशां करता ही रहूँगा ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/30

    rudra के द्वारा
    February 6, 2012

    सर जी. मैने बात हिंदी चैनल और हिंदी फिल्म की नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की कि है. :)

    rudra के द्वारा
    February 6, 2012

    एक और बात.. मई करीब एक महीने बाद जागरण पे आया . आपका ब्लॉग न पढने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. आपका ईमेल मिलता रहता है. अभी भी आपका ब्लॉग Java ऑब्जेक्ट error दे रहा है. मैं इन्टरनेट एक्स्प्लोरर ८ इस्तेमाल करता हूँ. शःय्द कोई जावा स्क्रिप्ट मैं प्रॉब्लम है. आप इसकी सुचना जागरण वालो को दे तो बेहतर होगा.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 6, 2012

    रूद्र जी , जैसा आपने लिखा है वैसा ही मुझे भी महसूस होता है ! मैं एक इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical engineering का लेक्चरार हूँ और बस से आता जाता हूँ ! लोग पढ़ते तो हैं मगर इंग्लिश नोवेल ही पढ़ते हैं ! वो शायद पढने से ज्यादा ये दिखाना चाहते हैं की हिंदी जैसी भाषा पढने से उन्हें गुरेज हैं किन्तु घर जाकर हिंदी चैनल ही देखते हैं ! मेरा कहने का सिर्फ यही मतलब था ! धन्यवाद ! मुझे भ्रष्टाचार वाले लेख पर भी आपकी प्रतिक्रिया चाहिए ! जो सबसे नया लिखा गया लेख है मेरा ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/30

    rudra के द्वारा
    February 6, 2012

    गुरूजी, धन्यवाद. मई घर जा के आपका लेख अवश्य पढूंगा और अपना प्रतिक्रिया भी दूंगा. आप भी मेरे नए लिखे रचना पे अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं. यहाँ पे आपकी लेख का पेज खुल नहीं प् रहा है.

Sumit के द्वारा
January 12, 2012

अब हम सिर्फ कहने को हिन्दुस्तानी रह गए है,,,,और इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो शायद आपको भी पता है http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/12/2025-का-बॉलीवुड/

    rudra के द्वारा
    February 6, 2012

    भाई साब. हिन्दुस्तानी होना और हिंदी जानना दो अलग चीजे हैं. दक्षिण भारत का एक तमिल उतना ही हिन्दुस्तानी है जितना की आप. भाषा को देश से न जोड़े तो बेहतर है.

dineshaastik के द्वारा
January 8, 2012

आपका आलेख पढ़कर, उठ रहा आक्रोश मन में, इस समस्या  के  लिये  ये,  कौन  जिम्मेदार  है। हाथ में अपने नहीं कुछ, सिर्फ हैं अफसोस करते, भारतीय हम कहना हमको, रूद्र जी धिक्कार है।

alkargupta1 के द्वारा
December 13, 2011

हिंदी साहित्य जितना पढेंगे उसमें उतना ही डूबते जायेंगे हमारी भारतीय संस्कृति हिंदी साहित्य में ही मिलती है अब आपको हिंदी भाषा की सरसता व सरलता का अहसास स्वयं ही हो गया होगा हिंदी साहित्य के प्रति लगाव व रूचि जागृत होना आप जैसे कम्पूटर इंजीनियर के लिए निश्चित ही प्रशंसनीय है ….अपने भावों को व्यक्त करने के लिए हिंदी जैसी अन्य भाषा नहीं……..शुभकामनाएं

    rudra के द्वारा
    December 14, 2011

    अलका जी धन्यवाद. सही कहा आपने भारतीय संस्कृति अब हिंदी साहित्य मे मिलती है.

nishamittal के द्वारा
December 8, 2011

यही हमारा दुर्भाग्य है कि हम और हमारे सत्ताधीशों ने हिंदी को व्यवहारिक महत्व नहीं दिया और आज तो मनोवृत्ति ही बन गयी हैं,अंग्रेजी,पढना ,लिखना और अंग्रेजी जीवन पद्धति अपनाना

    rudra के द्वारा
    December 8, 2011

    निशा जी आपने सही कहा है. इस निबंध के माध्यम से मैने यही बताने की कोसिस की है. बडे शहरों से हीनी बिलुप्त होती जा रही है और मैने यह महसूस किया है. इंग्लिश मैं बात करना faishon होता जा रहा है.

pawan kumar gupta के द्वारा
December 7, 2011

जब देश के लिए लड़ने की बारी थी तो सबने हिंदी का साथ लिया और जब खुद आगे बढ़ने की बारी आई तो अंग्रेजी का सहारा लेते हैं, इसीलिए देश विकाश नहीं कर रहा है केवल कुछ लोग विकसित हो रहे हैं.

shashibhushan1959 के द्वारा
December 7, 2011

रूद्र जी, सादर. अमृत लाल नागर, प्रेमचंद, आचार्य चतुरसेन, शरतचंद्र, बंकिमचंद्र आदि महान रचनाकारों का अध्ययन करें, आप अंग्रेजी लेखकों को भूल जायेंगे, जो पाँव के नीचे पीढ़ा रखकर उंचा होने का प्रयास करते हैं. सधन्यवाद.

    rudra के द्वारा
    December 8, 2011

    शशि जी. मैने इन रचनाऊ के पढने के बाद सही मैं अंग्रेजी लेखको को भूल गया. लेकिन सच्ची यह है की आज कल के शहरी युवा कितने हिंदी लेखेओ के नाम जानते हैं? मेरा दूसरा प्रश्नं यह है की अभी कौन सी हिंदी उपायास है जो इन् दो वर्षों मैं लिखी गयी और प्रशिद्द हुई. अंग्रजी मैं आप सक्दो ना याद दिला दें. लेकिन हिंदी मैं?

December 6, 2011

साफ़ शब्दों में कहा जाए, तो ये एक धिक्कार है हमारे देश की तथाकथित आधुनिक पीढ़ी पर. अंग्रेजी अपन जगह होगी.. ! पर हिंदी को अपमान की दृष्टि से देखना, अर्थात अपनी जड़ों से नफरत करना. अगर हिंदी-लेखक मन से कोशिश करें, और पीछे न हटें, तो हिंदी का खोया सम्मान ज़रूर वापिस आएगा. सदर शुभकामनाएं.

    rudra के द्वारा
    December 8, 2011

    मैं यह नहीं कह रहा की हिंदी को कोई अपमान की दृष्टी से देख रहा है मैं यह कह रहा हूँ की वर्त्म्मान मैं जो भी हिंदी साहित्य लिखी जा रहीं हैं वो युवा वर्ग तक नहीं पहुच प् रही और पर्सिध्ह नहीं हो पा रहीं हैं जैसे की प्रेमचंद के समय हुआ करती थी. मैने कुछ वर्त्तमान हिंदी की उअप्न्यास देखे भी जो की दोयम दर्जे के थे. अभी हिंदी मैं लेखकों की कमी होती जा रही है और वो अंग्रेजी लेखको की तरह प्रसिद्दी नहीं पा रहे. चेतन भगत का उदाह्ह्रण सामने है.

    December 14, 2011

    क्षमा करें.. शायद आप मेरा अभिप्राय नहीं समझे. मेरे शब्द कोई केवल आपके विचारों पर आधारित नहीं थे. पर ये मेरे मन की पीड़ा है. हिंदी को सचमुच अपमान की दृष्टि से ही देखा जाता है. और हिंदी के पाठक भी तो इसीलिए घट रहे हैं. और कोई तो कारण ही नहीं है. हाँ, और ये भी है, की हिंदी के लेखकों को भी समयानुसार ज्यादा गंभीर होने की आवश्यकता है.

    rudra के द्वारा
    December 15, 2011

    यह बात आपने शत प्रतीशत सही कहा है. आपसे मैं सहमत हूँ की हिंदी के लेखको को जयादा गंभीर होने की जरूरत है और थोडा बहुत मार्केटिंग की भी आवश्यकता है जिससे वो बाजार तक पहुच सके.

rudrapunj के द्वारा
December 6, 2011

क्या बात है |अच्छा लिखा और युवती को भी अच्छा जबाब दिया रुद्रनाथ त्रिपाठी “पुंज “


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